बोलो, पाश, कुछ तो बोलो

“सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना”
पाश, तुम्हारे ये लब्ज़ मेरे राख को भी कुरेदते हैं,
हां, सपनों का मर जाना तो ख़तरनाक होता है, लेकिन, नहीं मरे हैं मेरे सपने अभी तक,
लेकिन, मैं सहमा क्यूं हूं? क्यूं विवश और अशांत हूं?
मेरे सपने तो जिंदा हैं, लेकिन, मेरे सपनों में उनके सपनों को मरते देखना उतना हीं नासूर बन उभरा है जितना तुम्हें छलनी करती गोलियां।

उनका भी मंजर वहीं, जो हमारा है,
शहर दूसरा तो क्या, मंज़िल थोड़े ही जुदा है।

किसने कहा कि तुम्हें उन गोलियों ने मारा, “अब विदा लेता हूं” — क्या तुम्हें हमारे मर्म का एहसाह नहीं?
क्यूं विलुप्त हो गए हमें छोड़ कर उस “भारत” में जो अभी भी “अर्थहीन” है, आखिर क्यूं?
वह “खेत, वह “अन्न”— सभी हैं यहां, वैसे हीं जैसा तुम छोड़ गए थे।
नहीं है तो उनका सृजन करने के बावजूद भोग करने वाला।
हां, वहीं पूंजीवाद, वहीं विडंबना।
नहीं है तो वो देश, जो ज़मीन से नहीं, जमुरियत से बने।

वो “लकीर” भी पत्थर जो “लहू” को “लौह” ना माने,
और पाश को राक्षस, और वो राक्षस ही क्या जो काली चमड़ी बिना राक्षस कहाए।
और, पाश, तुम मुस्कुराओ जब तक तुम्हारे किलकार हमारे जख्म ना बन जाए।
इससे उभरे तासीर का क्या जो ना तुम्हें पता और ना हमें,
उस जमाने का क्या जो मिट्टी और मानव में फर्क ना समझे,
समझे भी कैसे, मिट्टी ही तो सबकी तकदीर है।

मुझे प्रतीत होता है कि मृगतृष्णा है आज़ादी, क्या आज़ादी वास्तविकता में किसी को मिली भी है क्या?
क्या है कोई स्वतंत्र, ओ मेरे परतंत्र पाश?
युद्ध तो सर में लड़े जाते हैं, सर के बल और सर के लिए
क्या वह सर भी पृथक् है उन अत्याचारियों से जिनसे, पाश, तुमने कभी हार ना मानी?
हमें आज जब तुम्हारी बेहद जरूरत है तो तुम गायब हो।
आखिर, तुम किस सोज में सोए और किस सोच में डूबे हो?
तुम हो, इससे कतई इंकार नहीं, लेकिन वह राह अनंत है जिसके आखिरी छोर पर हो तुम।

उन्होंने बोला—तुम मूर्छित हो, कुछ ने तो तुम्हें मुर्दा कह डाला।
ऐसा मान कफ़न भी लाया हूं, तुम ना लौट आए तो अपनी मौत से पहले तुम्हें मरा ना तो कम से कम बुजदिल तो मान लूंगा।
तुम्हारा जनाज़ा भी खाली है, इस अदृश्य पाश को जलाऊ या दफनाऊ,वो भी नहीं सूझता,
तुम्हारा मज़हब क्या था, वो तो बता जाते।
चलो, कोई वास्ता नहीं, तुम गुम लेकिन गुमनाम तो नहीं।
चलो, तुम्हारी कफ़न को उन अम्मियों के पास छोड़ आऊंगा जो खुद को बांझ तो नहीं कह सकती, लेकिन, अश्रु के पस्मिना में अपने वारिसों को खेला रही हैं।
और उन यतीम और बेवाओं को भी बोल दूंगा कि तुम एक दिन आओगे,
जरूर आओगे, “आज़ाद” या फिर मौत के “गुलाम” बनकर।
हां, मिलेंगे हम, बारामूला में, क्या तुम्हें शीतयुद्ध नहीं तो शीत तो पसंद होगी ही?
अगर तुम ना लौट के आए तो मान लूंगा कि दूसरे गुमशुदा भी ना लौट के आयेंगे।

क्या तुम्हारी “लौह कथा” सिर्फ कथा ही थी, तुम कुछ लौह की गोलियां भी ना सह पाए?
मिलेंगे हम झेलम किनारे, क्या नदी भी देश देखकर बहती है,
तुम भी तो एक नदी ही थे, किस सागर में जा मिले,
“दुनिया में बोहोत कागज़ है, तुम ये जरा हमें भी खत लिख बताओ।”
हे पथदर्शक, तुम ही गिर पड़ोगे तो हम कैसे उठेंगे।
पाश, तुम्हारी बैसाखी भी गिरी पड़ी है,
उस बैसाखी को भी बैसाखी चाहिए, क्या अब उसे भी “शहीद” करार दूं?
मानना तो बस मन रखना है, मन और मानसिकता थोड़े ही किसी के अधीन हैं, पाश?

तुम बापू किसे कहते हो—मैंने इसे जानने की उत्सुकता अभी तक जीवित रखी है—शायद बापू से तुम्हारा लगाव हश्र तक सांझा करना था।
इस परिवेश में उन पार्थिव पराकाष्ठा की कोई मजाल नहीं की कोई दूसरे “बापू” और “पाश” तुम्हें फिर से गढ़ पाए।
ये जंजीर बड़े दानवी और दुखदाई हैं, पाश, तुम इन्हें तो कम से कम ढीला कर दो,
या स्वीकार कर लूं क्या, कि तुम “मुर्दा” ही हो? बोलो, पाश, कुछ तो बोलो।

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