क्यूं रे?

चांद भी प्यासा, मैं भी प्यासी, ढूंढू रही कब से बस एक घूंट पानी रे,
जिस तलाश निकली मैं, ओ राह गुजर गई बिन तेरे कैसे रे?
दर्द, राग, द्वेष, लोभ, मोह का पाठ पढ़ाता तू सबको रे,
तो खुद के गिरेबान में झांक कर क्यूं नहीं देखता तू अपने रे?

राई का राष्ट्रप्रेम और देशद्रोह सिर्फ द्विज का रे,
लांछित नहीं तो क्या, फिर जड़े हैं खुद में मोती तूने क्यूं अभिमानी रे?
नून-रोटी और तेल-भात से पेट भरे मेरा और चांदनी छत सिरहाने उदास मेरे रे,
तो आज क्यूं चिल्लाता चांद पर पहुंचना सबका गौरव रे?

नहीं चाहिए तेरी विषादग्रस्त सांतवना, ना हीं गुर्दे दान में तेरे रे,
हवस तेरा, चीखें मेरी, किस बात से मिलती मुझे कहे तू जिसे इख्तियार रे?
तू है कौन कि पूछे यह की है सौदागर मेरे जिस्म का दूसरा कौन रे,
नोच-नोच जिसे कौए खाए, रह सकती कैसे ओ अंत सांस तक कुचलित रे?

पंखे मेरी कुतर दी तूने, जब-जब चाहा मैंने फैलाना रे,
और, मुझसे क्यूं ना पूछता कि मुझे कितना घिनौना लगता दोगलापन तेरा रे?
किसका शसक्तीकरण और किसकी शक्ति, तूने ही तो हमेशा मुझे पल्लू सरकाना सिखाया रे,
आजा, आज नोच ले फिर से, घबरा मत, बोटी-बोटी पर अधिकार जो है तेरा रे?

आश्चर्य यह नहीं कि तू हैवान है, अपितु, तू वास्तविकता में पाषाण बराबर भी ना रे,
यह मेरा कर्तव्य नहीं कि पितृसत्ता को बार-बार मात पर पटकूं, सुन, माफ तुझे हर बार क्यूं कर दूं रे?
मेरे फ़र्ज़, मेरी मरहम, मैं महरम, दर्द और ज़ख्म भी तो मेरे रे,
तू मुझसे मलिन ना होता , परछाई की तूने अपने क्यूं ना सुनी जो तेरे घृणा से हो गई अलहदा रे?

वचन में तूने नागपाश से मुझे जकड़ा, मकसदों को हासिल किया तूने अपने रे,
मेरी पवित्रता समाज का प्रश्न, अकेली मैं कैसे हुई तख्त पर लटकती वैभीचारिनी रे?
परिणीत हुई ना होती मैं तुझसे, रश्म-रिवाज़ खाते जाए मुझे रे,
अंजुमन तेरे तरफ, ओ समाज भी तेरा, घास-फूस की कोल्हू मैं ही क्यूं रे?

तू कहे तो सरस्वती, तू कहे तो दुर्गा-काली, तू माने तो काव्य-कोकिला भी रेे,
कलाकार की प्रेरणा माने, तो रखैल-वेश्या क्यूं कहलाऊं मैं रे?
मेरे नाम के स्वर तुझसे सुने कभी नहीं मैंने, ना ही योग के लक्षण रे,
नाम मेरा गाली, खुद भी गाली पर्याय क्यूं हर बार बनूँ मैं रे?

निरादर, दुराचार, तिरस्कार, बलात्कार—क्या कुछ नहीं है मेरे खोने के रे,
है बची तो यह जिंदगी है, ओ लघु प्यास है, और पाने को क्यूं नहीं समानता रे?
रही विभीषिका सपनों में भी, कभी दो छन भी प्यार किया ना तूने रे,
मैं तेरी चिता पर क्यूं बैठूं, क्या तूने मेरी आग सही है रे?

तू विचारे तो मैं जिंदा, मरना भी तेरे सम्मान में पड़े मुझे ही रे,
तेरे नाक की श्रेष्ठता तो कभी अखों का तारा और मान-मर्यादा, कभी मुझसे भी पूछा कि मैं हूं क्या रे?
थोपे मुझपर अपना मुकदमा जैसे मैं तेरी थाती-जागीर रे,
वस्तु नहीं, प्राणी हूं मैं, है मुझमें कुछ बची अंतरात्मा की अभिलाषा अभी तक रे,
ये बात, बता तू, कब तक समझेगा रे? ये बात कब तक समझेगा रे?

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  1. Ajay kumar says:

    क्या खूब लिखा है अपने ..अति सुन्दर लेखनी ..

    Liked by 1 person

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