रवीश कुमार जी, भूतकाल में देखिए, मादी शर्मा से बड़ा बेताल एनडीटीवी नामक विक्रम के कंधे से लटका पाएंगे

माननीय संपादक रवीश जी,


छठ की हार्दिक शुभकानाएं। आपका बिहार आना हुआ, जान कर खुशी हुई। अब कुछ दिल्ली की बात करें, और देश की भी, पत्रकारिता और दोहरे मापदंड की भी ।


‘मादी शर्मा’ नाम है न उनका, जिन पर बहस छिड़ी है, “दूसरे दरवाजे” की चाभी वाली । आखिर कैसे एक अनजान चेहरा मोदी सरकार के लिए “दूसरे दरवाजे” से यूरोपियन संघ के सांसदों को कश्मीर भ्रमण के लिए ले आया। 


मेरा शीर्षक पढ़कर अजीब लगा होगा, लगना भी चाहिए । रुकिए, मुद्दे पर आ रहे हैं।आपको चेता दें कि यह स्वकथित निष्पक्ष पत्रकारों को उन्हीं  की  भाषा में जवाब है, कुछ और संपादकों के लिए आईना भी सिद्ध हो, कौन जाने? पत्रकार को Speaking Truth to Power के क़ायदे  पर चलना होता है, आप भी आज एक प्रकार की शक्ति ही हैं। मगर जब सच की खोज सही रास्ते से भटके, तो दर्शक का भी अधिकार है कि एंकर से पूछे। 


एनडीटीवी के लोकपाल का पता नहीं, इसलिए खुला पत्र लिखना ही विकल्प है। वैसे एन.डी.टी.वी का कोई लोकपाल है भी या नहीं, यह भी एक सवाल है। हो तो वह कई और लोगों को भी सच के “दूसरे दरवाजे” तक पहुंचा दे।


आज जिस प्रकार “मादी के दूसरे दरवाजे” पर प्रश्न उठ रहे हैं, काश वे राडिया और मनमोहन पर भी उठा लिए जाते ? इस पर क्या कहना हैं आपका ?   आपने इस विषय पर कोई कार्यक्रम किया हो तो याद नहीं, मैंने तलाशा लेकिन अभी कुछ मिला नहीं। शायद आप भूल गए हों । ज़रा क़ायदे से एनडीटीवीटी के पत्रकारिता के पैमाने टटोलकर देखें ।  

लीजिए, २०१० की बात है, नीचे कुछ लिंक हैं उन कारनामों के, जिसमें एनडीटीवी के भी दिग्गज शामिल थे: 

https://www.outlookindia.com/website/story/the-ratan-tata-barkha-dutt-other-tapes/268068

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बरखा दत्त, जो उस समय एनडीटीवी में कार्यरत थी, उन पर सवाल उठे। उठने भी चाहिए थे, बहुत लोगों ने उठाए। लेकिन एनडीटीवी, जो आज ठोस पत्रकारिता का प्रतीक बना बैठा है, उसकी दूरदृष्टि के क्या कहने…


आज 9 साल बाद आपने मादी शर्मा पर कार्यक्रम चलाया, आप ने उन्हें दलाल कहा, अंग्रेज़ी में ब्रोकर कह कर कुछ इज़्ज़त  बचा ली, लेकिन दलाल तो दलाल होता है।  २०१० में किसने दलाली की और दलाल का दलाल कौन बना यह आपको तो ज्ञात होगा। आज जब ब्रिटेन भारत से  सौ साल पहले हुए कुकृत के लिए माफ़ी  मांग सकता है, तो  यह तो बिलकुल हाल की बात है, अभी पुनर्विचार के लिए देर नहीं हुई ।


एनडीटीवी की दुहाई एक निंदा तक ही सीमित रह गई। कभी भी एनडीटीवी ने नहीं माना कि जो बरखा दत्त ने किया, वह न सिर्फ़ ग़लत था बल्कि पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों  के घोर विपरीत था। एनडीटीवी ने बरखा दत्त कांड पर क्या कहा? आप पुनः पढ़ सकते हैं और अपने दर्शकों तक पहुंचा सकते हैं। वैसे आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे, मगर एक बारगी एनडीटीवी के मापदंडों पर पुनर्विचार ज़रूर करें।

चलिए उस समय तो भावना भावी होगी, लेकिन इस विदाई संदेश में भी सच की कोई स्वीकृति नहीं है। कोई पढ़ कर कहे कि ‘ दोहरे मापदंड की भी सीमा होती है’, तो चौंकिएगा नहीं। 

और जिस “वायर” की आप उल्लेख और तारीफ़ करते नहीं थकते, उससे ताल्लुक़ रखने वाले कुछ संपादकों, जिनका नीरा  राडिया से क़रीबी नाता था, उनके भी नाम याद कराने की जरूरत है ।


वायर के लिए मैंने भी लिखा है, अब नहीं लिखता । आपका मादी शर्मा वाला लेख उन्हीं ने प्रकाशित किया है, पढ़ा मैंने। लेकिन विनोद दुआ पर आपकी ज़ुबान कैसे बंद पड़ गई ? कैसे निष्ठा जैन को ही लगभग दोषी करार कर दिया गया? मेरे पास एक्सक्लूसिव बातचीत के रिकॉर्ड्स और डॉक्युमेंट्स हैं जो वायर के चरित्र को सामने लाने के लिए काफ़ी  हैं, क्या आप स्वयं प्रकाशित करना चाहेंगे? बोलिए करेंगे ? चुप पड़ गई पत्रकारिता आपकी ? औरत के अधिकारों का चीरहरण मोदी घृणा की प्राथमिकताओं के आगे फीका पड़ गया ? कुछ कहिये, ‘वॉयस ऑफ वॉयसलेस’ ?  


आज तथाकथित वामपंथी-लिबरल मीडिया को तार्किक आलोचना की बेहद ज़रूरत है। आप निर्भीक रहिए, हम यहीं मिलेंगे अगले लेख के साथ, जब कभी आप सत्य की राह से भटकें । 

इनक़लाब जिंदाबाद, 
उज्ज्वल कृष्णम


संपादन : प्रो . अक्षय बक़ाया

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