जुआ शीर्षकों का

आडवाणी जी का जन्मदिन है, भाजपा में खुशी की लहर है। लहर खबरी मीडिया में भी है— चापलूसी की। आज तक ने एक ऑनलाइन  लेख में आडवाणी की खूब तारीफ की है। हैरानी इस बात की है कि अग्रणी हिंदी खबरी मीडिया ने आडवाणी को १९९२ का हीरो कहा। हां, वहीं ९२ जिसके विषैले धर्म आधारित राजनीति के उपज में देश आज फंसा है।  शीर्षक ने यह बात साफ कर दिया गया कि मीडिया किस तरफ़ थी लेकिन जैसे ही विकास कुमार जैसे पत्रकारों ने चिंता जताई तो झट से शीर्षक बदल दिया गया। इसके बावजूद अभी भी पदों में हीरो ही लिखित है। यह तो वाशिंगटन पोस्ट का ही किस्सा हुआ न? बगदादी को संत बताओ…


यह शीर्षकों का खेल सिर्फ ‘आज तक’ तक ही नहीं रुका, इसके चपेट में लिबरल मीडिया भी है। जी हां, प्रिंट। आतिश तासीर के ओआईसी कार्ड को रद्द करने की बात सामने आई, लेकिन इस मीडिया ने उसको बिना सबूत के आधार पर उनके टाइम मैगज़ीन के कवर स्टोरी से इस घटनाक्रम को जोड़ दिया। इसको नहीं नकारा जा सकता कि तासीर के शब्द इसका जड़ हैं, परन्तु दोष तो शब्दों का नहीं है, यह है डॉक्युमेंट्स का। हर बात में किसी एक व्यक्ति को गरियाना आज की राजनीति का अभिन्न हिस्सा है। क्या ऐसे बक-बक करने वालों के दुनिया में अवतरण का भी श्रेय मोदी को हीं दिया जाना चाहिए? अब फर्जीवाड़ा करोगे तो भुगतेगा कौन? आखिर किसने गुजरात दंगों के पीड़ितों के मदद के लिए इकट्ठे पैसे से दारू मंगाया? आपको भी पता होगा, तो दोष मोदी को क्यूं दें? और आरोप लगाने वाला एक मुस्लिम ही था।

पीड़ित कार्ड का खेलना ही है कि एक धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी के सामने न ही एक विपक्ष है और न ताकतवर मीडिया जो तथ्य आधारित आलोचना कर सके। पाठक कोई मूर्ख नहीं होता, उसे भी दिखता है प्रोपगंडा क्या है और सच्चाई क्या…

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